रविवार, 24 अप्रैल 2011

यह मसाइल-ए तसव्‌वुफ़ यह तिरा बयान ग़ालिब तुझे हम वली समझ्‌ते जो न बादह-ख़्‌वार होता

बात सही है कि चचा ग़ालिब अपनी बादाखारी(शराबखोरी) के नाम से बदनाम रहे. अपनी इस आदत को उन्होंने खुद ही कभी राज नहीं रहने दिया, रह-रह कर अपनी शायरी में खुद ही इस बात का ऐलान करते रहे. फिर इस शेर के मार्फ़त मान भी लिया कि वो क्या? हो सकते थे. ये बात भी सही है  कि गर चचा छिप-छिप कर पीते और अपना काम करते रहते तो वली ही होते( वैसे उनके चाहने वाले उन्हें इस से बढ़ कर मानतें हैं). 
चचा ग़ालिब की चर्चा इसलिए कि शराब के मामले में अपने आसपास बहुत कुछ घट रहा है लेकिन उस पर खुली चर्चा कहीं नहीं होती, मेरा मतलब शराबियों की तकलीफ से है. बंद कमरों में बरसों से पी रहे लोग जाम उठाते हैं, बहसबाजी के बीच दो चार मुद्दे शराब के उठतें हैं जो कि वहीँ बाट्म्स अप के साथ समाप्त हो जातें हैं. शराब पर लिख कर कौन अपनी फजीहत कराये? इससे हो ये रहा कि इस धंधे में चारों तरफ खुला खेल फर्रुक्काबादी चल रहा है. मैंने ठाना है कि इस पर कुछ चर्चा कर ही ली जाए. 
* पहली बात- आम चर्चा ये कि छत्तीसगढ़ शासन ने शराब माफियाओं के सिंडिकेट को तोड़ने के लिए पिछले दो चार बरसों से नई आबकारी नीति बनायी हुई है, जिसे इस साल शराब माफियाओं ने सिंडिकेट बना कर ध्वस्त कर दिया है. तो क्यों नहीं इस साल के ठेके रद्द किये जा रहें हैं?
*दूसरी बात- शराबी इस बात से परेशान हैं कि जिन ब्रांडों की बाटलिंग छत्तीसगढ़ में हो रही है उनके टेस्ट में हर बार बदलाव रहता है, आलम ये है कि एक ही ब्रांड को अलग-अलग दुकानों से लेने में स्वाद अलग-अलग मिलतें हैं, क्वालिटी कंट्रोल कहाँ है?
*तीसरी बात- नामी ब्रांडों की बाटलिंग करने वाले अपना कोई ब्रांड नहीं ला सकते लेकिन यहाँ तो नामी ब्रांड से मिलती जुलती पैकिंग के ब्रांड भी निकल रहें हैं? देखने वाला कौन है?

बातें तो बहुत हैं, उन पर चर्चा आगे भी जारी रखूँगा फिलहाल चलते-चलते एक खबर पर चर्चा-
बिलासपुर शहर में शराब माफियाओं के झगड़े में गुड फ्राई डे के दिन एक मसीही भाई एक पेटी शराब के साथ पकड़ा गया, उसकी शराब कार सहित जब्त कर ली गई. एक आदमी चार बोतल से ज्यादा शराब नहीं रख सकता, इस नियम का शिकार वो बन्दा हो गया. एक निजी कंपनी में मुलाजिम बेचारा कुछ नहीं कर सका. शराब माफियाओं के हाथ में ही इस शहर का केबल प्रसारण है, इस लिए सभी ने अपने अपने अंदाज़ में इसे खूब  दिखाया, अखबारों में भी उसकी तस्वीर छपी. किसी ने उसका साथ नहीं दिया वरना वो जिस धर्म से अपना ताल्लुक रखता है उसके अनुसार वो न केवल अपने, बल्कि अपनी बीबी और माँ-बाप के नाम की चार-चार बोतलें रख सकता है.

शनिवार, 9 अप्रैल 2011

कुत्ते की दुम ---

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 अन्ना हजारे के समर्थन में शुक्रवार शाम को बिलासपुर में लोगों ने सी एम् डी चौक से लेकर पुलिस लाइन तक कैंडल मार्च किया. इसमें हर वर्ग के लोग शामिल थे. इस मार्च का समापन पुलिस मैदान में राष्ट्र गान के साथ होना था. जब ये यात्रा पुलिस मैदान पहुंची तो पाया कि गेट में ताला लगा हुआ है. आयोजकों ने वहाँ उपस्थित पुलिसवालों से कहा कि हमारे पास परमिशन है आप ताला खुलवाइए. वो अपनी हेकड़ी पर उतर आये और हीलाहवाला करने लगे, पहले कहा जिसके पास चाभी है वो कहीं गया है, फिर आर आई का हवाला देने लगे. आयोजकों ने खूब मिन्नतें की, सिविल लाइन थाने में गुहार लगाईं, फोन घुमाए किसी पुलिसवाले के कान में जूं तक नहीं रेंगी.
यात्रा का समापन अन्दर ही करेंगे और राष्ट्रगान मैदान में ही होगा की जिद के साथ सभी मोमबत्तीधारियों ने सामने  की सड़क पर कब्जा जमा लिया और नारेबाजी करने लगे, सड़क पर जाम लग गया. पंद्रह मिनट बाद गेट खुल गया.  

रविवार, 3 अप्रैल 2011

Indian Had taken Shrilanakn Tigers By Tail......

 ये लम्हे ताउम्र याद रहेंगे...