हाल में बिलासपुर छत्तीसगढ़ के मीडिया कर्मियों को जो अनुभव स्थानीय पुलिस से मिल रहे हैं उसमे अभी कई रंग और मिलने वाले हैं, क्योंकि प्रेस क्लब के वरिष्ठ सदस्य अपना दुखड़ा लेके जब पुलिस के आलाअधिकारी से मिले तो जो सलाह उन्हें दी गई उससे वो अभी तक सकते में हैं. प्रस्तुत हैं कुछ अंश-
* अरे इतने कैमरों कि जरूरत क्या है? आप लोग मिल बैठ कर तय कर लो कि किस कार्यक्रम में किसको जाना है? बाद में सभी लोग उससे फोटो या वीडियो शेयर कर लें.
* मैं तो मीडिया को रेगुलेट कर के ही रहूँगा! मेरे सामने ये भभड़ नहीं चलेगा, ये क्या तरीका है कि राज्यपाल भवन का उदघाटन करने के बाद पौधा रोपण करने जा रहे तो पच्चीस-तीस कैमरा उनके आगे-पीछे दौड़ने लगे? अरे भाई कितनी फोटो खीचोगे कितनी फोटो छपती है?
* ये कैमरामैन वी आई पी की सुरक्षा के लिए ख़तरा हैं. ये इनके लिए निर्धारित जगह पर कभी नहीं रहते सब तरफ घूम-घूमकर कैमरा चलाते रहते हैं, अरे कितने एंगल चाहिए?
* जहां धक्का-मुक्की होगी वहाँ पुलिस आएगी और उनको बाहर निकालेगी ही, क्योंकि पुलिस का काम ही है वव्यस्था बनाना.
* आप को प्रशासन के साथ बैठ कर ये तय कर हमें बताना होगा कि किसी कार्यक्रम मैं कितने स्टिल और कितने वीडियो कैमरे जायेंगे. इसके लिए आप चाहे सोनमणि के साथ बैठे या बैजेन्द्र कुमार के साथ, बैजेन्द्र का नंबर दूं? मैंने उन्हें पत्र भी लिखा है, या फिर मुख्यमंत्री से ही मिल कर ये बातें तय कर लें.....
तो भाइयों क्या विचार हैं आपके?
बाहर वाले मीडिया कर्मियों को बता दूं कि बिलासपुर में बाईट लेने गए कैमरामेन को सरकारी काम में बाधा डालने का आरोप लगा कर हवालात में डाल दिया गया, पत्रकारों ने जब गुहार लगाईं तो उनसे कहा गया कि उनकी जमानत का बंदोबस्त करो!
* एक कार्यक्रम में सुआ नाच कि फोटो खींच रहे सीनियर फोटोग्राफर से कहा गया " तू भी उनके साथ नाचेगा क्या? निकल वहाँ से".... इससे वहाँ मौजूद पत्रकारों में हलचल होने लगी तो उनसे कहा गया कि अभी आप लोग भी बाहर जाओ जब जरूरत होगी आप को बुला लिया जाएगा.....
बहरहाल आगे क्या-क्या होता है? हम सब देखेंगे, हाँ इतना जरूर हुआ कि आलाअधिकारी के कमरे से बाहर निकलते हुए एक वरिष्ट पत्रकार ने कहा कि ये तो वैसे ही हो गया जैसे गली में यहाँ वहाँ, कहीं भी पेशाब कर देने वाले बच्चे की शिकायत करने मोहल्लेवाले जब उसके बाप के पास पहुंचे तो देखा कि वो खुद अपनी छत में खड़ा होकर दूसरे की छानी में मूत रहा है....
कमल दुबे.
नए सबक, नए पहलू और नए नज़रिए सिखलातीं, दिखातीं और बनातीं कुछ असहज घटनाओं को सहजता से लेने का सब से अच्छा तरीका है, अपने आप से ये कहना कि " ऐसा भी होता है"!
शनिवार, 11 सितंबर 2010
सोमवार, 30 अगस्त 2010
कुरु कुरु स्वाहा!
पिछले कई बरसों से देख रहा हूँ कि बिलासपुर शहर में कहीं आग लगने पर स्थानीय युवकों व नेताओं के अन्दर मानो कोई दमकल जिन्न जाग उठता है? और वो पूरे अधिकार से वहाँ की कमान अपने हाथ में ले लेते हैं, फिर भिड़ जाते हैं आग बुझाने में. दिन हो या रात हजारों तमाशबीन इकट्ठा तो हो ही जातें हैं उनके बीच ये बर्राए बौराए लोग चीख-चीख कर पता नहीं किस-किस को क्या-क्या निर्देश देते हुए नज़र आते हैं? इस बीच कोई पत्रकार या परिचित दिख जाए तो हाथ हिलाकर उसका अभिवादन भी कर लेतें हैं और किसी दमकल के पहुँचते ही दमकलकर्मियों के साथ उनकी पाईप पकड़ कर जहां तहां पानी मारना शुरू कर देते हैं, कोई प्लानिंग नहीं होती न ही ये सोचा जाता है कि कितनी दमकलें और कितना पानी लगना है, सबका समन्वित उपयोग कैसे हो? यहाँ एस ई सी एल की दमकल(जिनको खदानों और कोयले की भीषण आग से खेलने का अनुभव रहता है), एन टी पी सी की दमकल(जहां आग और उसके ताप पर ही सब निर्भर है) और लाफार्ज की दमकल देर से ही सही पहुँच ही जाती हैं, लेकिन ये सब एक-एक कर आतीं हैं, खालीं होतीं हैं और चली जातीं हैं, ये सिलसिला लगातार चलता रहता है, चलता रहता है..आग पर पुरअसर हमला कभी नहीं होता और नतीजा हर बार एक सा ही रहता है कि आग तब ही बुझती है जब वहाँ जलने के लिए बाकी कुछ नहीं रहता.
पिछले शुक्रवार कि रात एक इलेक्ट्रानिक और फर्नीचर के बड़े शो रूम में आग लग गयी, शो रूम बंद नहीं हुआ था, आगत अनिष्ट की आशंका ने मालिक और कर्मियों को किमकर्त्तव्यविमूढ कर दिया! बदहवास से सब, कोई पुलिस, तो कोई दमकल को फोन लगाने लगा, कुछ सामान हटाने में लग गए, एकाध आग-आग चिल्लाते पड़ोसिओं से मदद की गुहार करने लगे. मददगार जुड़ने लगे सबसे पहले शो रूम का मेन स्वीच आफ किया गया(जरूरी था), वहाँ की पानी की मोटर बंद हो गयी, तब तक स्थानीय प्रशासन सक्रिय हो गया उसने उस पूरे इलाके की बिजली सप्लाई बंद करा दी, अड़ोसिओं और पड़ोसिओं के पम्प भी बंद.
पानी के लिए दमकल का ही आसरा रह गया, उसके आते-आते तक आग विकराल हो गयी. नगर निगम की बदहाल दमकल में इतना दम नहीं था कि उसकी धार आग पर सीधे मार कर सके, आग बढ़ती जा रही थी, एक-एक कर और दमकलें आने लगीं, दमकल जिन्नात भी हरक़त में आ चुके थे, कोई शटर में पानी मार रहा था, तो कोई साइन बोर्ड में, किसी ने बिजली के बोर्ड से धुआं निकलते देखा तो वहीँ धार मारने लगा. किसी को सूझा कि पीछे की दीवार को तोड़ कर वहाँ से पानी मारने से आग पर काबू जल्दी पाया जा सकता है, पिछवाड़े की गली संकरी थी, सो तोड़-फोड़ दस्ते के साथ छोटी दमकल वहाँ भेजी गयी. पीछे की दीवार टूटते ही अन्दर की आग को वेंटिलेशन मिल गया और वो दुगने वेग से भभक उठी, धन्य जिन्नात!
घंटो बाद एन टी पी सी, सीपत की दमकल अपनी टीम के साथ वहाँ पहुंची, उनके स्पाट इंचार्ज ने हालात का जायजा लिया और बिना किसी की सुने अपनी टीम से कहा हम अन्दर जायेंगे और उनकी टीम अन्दर की और चल पड़ी, एक छुटभैये की कान में बात पड़ी और वो उनके सामने आकर चिल्लाने लगा अन्दर जाओ, अन्दर जाओ...बहरहाल इस टीम ने अन्दर जा कर आग पर असरदार हमला बोल दिया, पी कौशिक, इस टीम के स्पाट इंचार्ज ने बाहर आ कर कहा कि हम दस मिनट में आग बुझा देंगे बस इतना कीजिये की बाकी दमकलों का पानी हमारी दमकल में डालिए, इसका प्रेशर बहुत है, एक दमकल ने ऐसा करना शुरू भी कर दिया, तभी एक नेता ने उनसे कहा ये क्या कर रहे हो? तुम लोग अपनी पाइप यहाँ लाओ, पाइप उनकी तरफ चली गयी, अन्दर घुसी एन टी पी सी की टीम के पास पानी नहीं बचा, वो लोग मनमसोसकर कर बाहर आ गए !
दूसरे दिन सुबह आठ बजे तक उक्त शो रूम खंडहर बन चुका था. हाँ दमकल जिन्नों के अट्टहास वहाँ अभी भी गूँज रहें हैं. इति.
कमल दुबे.
पिछले शुक्रवार कि रात एक इलेक्ट्रानिक और फर्नीचर के बड़े शो रूम में आग लग गयी, शो रूम बंद नहीं हुआ था, आगत अनिष्ट की आशंका ने मालिक और कर्मियों को किमकर्त्तव्यविमूढ कर दिया! बदहवास से सब, कोई पुलिस, तो कोई दमकल को फोन लगाने लगा, कुछ सामान हटाने में लग गए, एकाध आग-आग चिल्लाते पड़ोसिओं से मदद की गुहार करने लगे. मददगार जुड़ने लगे सबसे पहले शो रूम का मेन स्वीच आफ किया गया(जरूरी था), वहाँ की पानी की मोटर बंद हो गयी, तब तक स्थानीय प्रशासन सक्रिय हो गया उसने उस पूरे इलाके की बिजली सप्लाई बंद करा दी, अड़ोसिओं और पड़ोसिओं के पम्प भी बंद.
पानी के लिए दमकल का ही आसरा रह गया, उसके आते-आते तक आग विकराल हो गयी. नगर निगम की बदहाल दमकल में इतना दम नहीं था कि उसकी धार आग पर सीधे मार कर सके, आग बढ़ती जा रही थी, एक-एक कर और दमकलें आने लगीं, दमकल जिन्नात भी हरक़त में आ चुके थे, कोई शटर में पानी मार रहा था, तो कोई साइन बोर्ड में, किसी ने बिजली के बोर्ड से धुआं निकलते देखा तो वहीँ धार मारने लगा. किसी को सूझा कि पीछे की दीवार को तोड़ कर वहाँ से पानी मारने से आग पर काबू जल्दी पाया जा सकता है, पिछवाड़े की गली संकरी थी, सो तोड़-फोड़ दस्ते के साथ छोटी दमकल वहाँ भेजी गयी. पीछे की दीवार टूटते ही अन्दर की आग को वेंटिलेशन मिल गया और वो दुगने वेग से भभक उठी, धन्य जिन्नात!
घंटो बाद एन टी पी सी, सीपत की दमकल अपनी टीम के साथ वहाँ पहुंची, उनके स्पाट इंचार्ज ने हालात का जायजा लिया और बिना किसी की सुने अपनी टीम से कहा हम अन्दर जायेंगे और उनकी टीम अन्दर की और चल पड़ी, एक छुटभैये की कान में बात पड़ी और वो उनके सामने आकर चिल्लाने लगा अन्दर जाओ, अन्दर जाओ...बहरहाल इस टीम ने अन्दर जा कर आग पर असरदार हमला बोल दिया, पी कौशिक, इस टीम के स्पाट इंचार्ज ने बाहर आ कर कहा कि हम दस मिनट में आग बुझा देंगे बस इतना कीजिये की बाकी दमकलों का पानी हमारी दमकल में डालिए, इसका प्रेशर बहुत है, एक दमकल ने ऐसा करना शुरू भी कर दिया, तभी एक नेता ने उनसे कहा ये क्या कर रहे हो? तुम लोग अपनी पाइप यहाँ लाओ, पाइप उनकी तरफ चली गयी, अन्दर घुसी एन टी पी सी की टीम के पास पानी नहीं बचा, वो लोग मनमसोसकर कर बाहर आ गए !
दूसरे दिन सुबह आठ बजे तक उक्त शो रूम खंडहर बन चुका था. हाँ दमकल जिन्नों के अट्टहास वहाँ अभी भी गूँज रहें हैं. इति.
कमल दुबे.
रविवार, 8 अगस्त 2010
Pramod Maravi
शिवतराई, कोटा, जिला बिलासपुर, छत्तीसगढ़.
पिछली ३१ जुलाई को २१ वर्षीय प्रमोद मरावी( गोंड आदिवासी) ने सुबह ९ बजे अपने घर में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली. उसने कोई सुसाइड नोट नहीं छोड़ा इसलिए आजतक ये पता नहीं चल पाया है कि उसने आखिर ऐसा क्यों किया? हमने पुलिस से पूछा, उसके मित्रों से मिले, उसके गाँव घर तक गए लेकिन कुछ भी पता नहीं चला.
प्रमोद ने बारहवीं की परीक्षा बायलाजी में सेकण्ड क्लास में उत्तीर्ण की थी. शिक्षा कर्मी बननेवाला था वो, कोटा कालेज में उसका फर्स्ट इयर में एडमिशन भी हो गया था. अल्पभाषी, संकोची प्रमोद मे कोई ऐब नहीं था. न कोई प्रेम-प्रसंग, ना ही वो कोई नशा करता था. तीरंदाजी से सबंधित इतने प्रमाण-पत्र कि उनकी फोटोकॉपी कर कहीं जमा करने में ही फीस से ज्यादा पैसा उसे लगता. फिर क्यों?
प्रमोद मरावी के इस तरह से चले जाने का मुझे और मेरे परिवार को बहुत अफसोस है. कारण कि आज से ढाई बरस पहले जब मुझे पता चला कि पंद्रह सौ की जनसंख्या(आदिवासी बाहुल्य) वाले शिवतराई जैसे छोटे से गाँव में तीरंदाजी के ३२ राष्ट्रीय और राज्यस्तरीय खिलाडी हैं तो में दूरदर्शन के लिए ये खबर बनाने वहाँ गया(२७-०१-२००८), अकेला था सो गाडी में बीबी-बच्चे भी आ गए. वहाँ हमने ५६ मिनट का फिल्मांकन किया, शिवतराई के लोगों ने मेरी और मेरे बच्चों की यथाशक्ति खातिरदारी की. बीबी-बच्चों को गाँव घुमाया.
सभी खिलाड़ियों से मैंने बातचीत की, उनके गुरु इतवारी राज से भी बात हुई. इसी दौरान में प्रमोद मरावी से भी मिला. उसकी तीरंदाजी से में बहुत प्रभावित हुआ, दूर से सीधा बुल्स आई! असीम संभावनाएं थीं उसमें! साथ के विडिओ में उसे देखें (दूरदर्शन से साभार).
भगवान् उसकी आत्मा को शान्ति प्रदान करे! इति.
कमल दुबे. ०८.०८.१०.
पिछली ३१ जुलाई को २१ वर्षीय प्रमोद मरावी( गोंड आदिवासी) ने सुबह ९ बजे अपने घर में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली. उसने कोई सुसाइड नोट नहीं छोड़ा इसलिए आजतक ये पता नहीं चल पाया है कि उसने आखिर ऐसा क्यों किया? हमने पुलिस से पूछा, उसके मित्रों से मिले, उसके गाँव घर तक गए लेकिन कुछ भी पता नहीं चला.
प्रमोद ने बारहवीं की परीक्षा बायलाजी में सेकण्ड क्लास में उत्तीर्ण की थी. शिक्षा कर्मी बननेवाला था वो, कोटा कालेज में उसका फर्स्ट इयर में एडमिशन भी हो गया था. अल्पभाषी, संकोची प्रमोद मे कोई ऐब नहीं था. न कोई प्रेम-प्रसंग, ना ही वो कोई नशा करता था. तीरंदाजी से सबंधित इतने प्रमाण-पत्र कि उनकी फोटोकॉपी कर कहीं जमा करने में ही फीस से ज्यादा पैसा उसे लगता. फिर क्यों? प्रमोद मरावी के इस तरह से चले जाने का मुझे और मेरे परिवार को बहुत अफसोस है. कारण कि आज से ढाई बरस पहले जब मुझे पता चला कि पंद्रह सौ की जनसंख्या(आदिवासी बाहुल्य) वाले शिवतराई जैसे छोटे से गाँव में तीरंदाजी के ३२ राष्ट्रीय और राज्यस्तरीय खिलाडी हैं तो में दूरदर्शन के लिए ये खबर बनाने वहाँ गया(२७-०१-२००८), अकेला था सो गाडी में बीबी-बच्चे भी आ गए. वहाँ हमने ५६ मिनट का फिल्मांकन किया, शिवतराई के लोगों ने मेरी और मेरे बच्चों की यथाशक्ति खातिरदारी की. बीबी-बच्चों को गाँव घुमाया.
सभी खिलाड़ियों से मैंने बातचीत की, उनके गुरु इतवारी राज से भी बात हुई. इसी दौरान में प्रमोद मरावी से भी मिला. उसकी तीरंदाजी से में बहुत प्रभावित हुआ, दूर से सीधा बुल्स आई! असीम संभावनाएं थीं उसमें! साथ के विडिओ में उसे देखें (दूरदर्शन से साभार).
भगवान् उसकी आत्मा को शान्ति प्रदान करे! इति.
कमल दुबे. ०८.०८.१०.
बुधवार, 21 जुलाई 2010
शनिवार, 3 अप्रैल 2010
ऐसा भी होता है!
शुक्रवार की दोपहर को न जाने कितने मकानों के मालिक रामविलास पासवान के दिल्ली स्थित एक मकान के पिछले हिस्से में आग लगी और दो कारें जल गयीं, ये समाचार लगभग सभी चैनलों में पहले ब्रेकिंग बाद में विस्तार के साथ चला. ठीक उसी दोपहरी को छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में भटचौरा नाम के एक गाँव में आग लगी ११ पैरावट और ३१ झोपड़ियां जल गईं, याने ३१ परिवार एक ही पल में छतविहीन हो गए, अनेकों के पास सिर्फ उतना ही बचा जितना कपड़ा वो पहने हुए थे. बाकी बर्तन-भांडा, कपड़ा-लत्ता, दानापानी, जमापूंजी और खटिया बिस्तर सब जल के खाक हो गया. पत्रकारों और संवाददाताओं को समय पर खबर लग गयी, लेकिन बड़े चैनलों को लिए ये कोई खबर नहीं थी. इति.
रविवार, 28 फ़रवरी 2010
होली और धर्मयुग
होली और धर्मयुग
पत्रिकाओं से मेरा नाता हमेशा से ही कुछ अजीब रहा है. जब मैं बच्चा था किसी ने हाथ में पराग' पकड़ा दी, उन दिनों वो किशोरों कि पत्रिका हुआ करती थी, मेरे किशोर होते तक पराग" बच्चों कि पत्रिका हो गयी, मैंने पहली धारावाहिक कहानी "बहत्तर साल का बच्चा" पराग में ही पढ़ी. चंदामामा से मेरा जुड़ाव नहीं हो पाया, पत्रिकाएं और भी थीं, गाहे-बगाहे उन्हें भी पढ़ता था. तभी किसी के यहाँ धर्मयुग का होली अंक पढ़ने को मिला, फागुनी हास्य से भरपूर, बीच के पन्नों (फुल पेज) में टेसू के फूलों के बीच एक अल्हड नवयौवना कि तस्वीर के साथ "यार कमाल हो गए" कविता, मेरा किशोर मन बाग़-बाग़ हो गया. वहाँ से सीधा बुक कार्नर गया( अंबिकापुर में तब वो पत्रिकाएं मिलने का एकमात्र स्थान था), काउंटर पर बैठे सेठी अंकल ने बताया कि बेटे धर्मयुग का होली अंक तो आते ही पूरा बिक जाता है' मैंने जिद की, उन्होंने बाद में मंगा कर देने की बात कही. बाद के वर्षों में जब तक धर्मयुग छपती रही मैं जहां भी रहता, उसकी एडवांस बुकिंग करता रहा और होली में धर्मयुग की रचनाएँ पढ़ कर, होली की महफ़िलों में धाक जमाता रहा, रेडियो में भी जिक्र करता रहा. अफ़सोस की वो बंद हो गयी.
कुछ रचनाएँ आज भी याद आतीं हैं जिन्हें मैंने कई जगह पोस्ट किया है, कुछ यहाँ भी डाल रहा हूँ, पूरी तरह से याद नहीं हैं, रचनाकारों के नाम भी पूरे याद नहीं हैं, अगर किसी को पूरा याद हो तो मुझे जरूर अवगत कराएं-
१. ----?
टेसू वन दहके,
मौर रसाल हुए,
चितवन बहके,
गाल गुलाल हुए,
......... अंग अंग महके, यार कमाल हुए!
२. चन्द्र ठाकुर-
बुरा न मानो होली है, चुनरी गीली कर लेने दो,
ये रस की ऋतू, वय का उत्सव, बीत न जाए बिना मनाये,
लज्जा से अरुण कपोलों पर कुछ आज रंगोली कर लेने दो,
बुरा न मानो होली है, चुनरी गीली कर लेने दो....... .
३. नीरज-
प्यार के बोल तो बोलें सभी
पर प्यार की की न वो अब बोली रही है,
कान्हा की छेड़ न छाड़ रही वो अब
रहने को सिर्फ ठिठोली रही है,
रंग कहाँ पिचकारी कहाँ वो अब,
खाली गुलाल की झोरी रही है,
राग न वो अब, फाग न वो अब
होली न वो अब होली रही है.....
कमल दुबे.
पत्रिकाओं से मेरा नाता हमेशा से ही कुछ अजीब रहा है. जब मैं बच्चा था किसी ने हाथ में पराग' पकड़ा दी, उन दिनों वो किशोरों कि पत्रिका हुआ करती थी, मेरे किशोर होते तक पराग" बच्चों कि पत्रिका हो गयी, मैंने पहली धारावाहिक कहानी "बहत्तर साल का बच्चा" पराग में ही पढ़ी. चंदामामा से मेरा जुड़ाव नहीं हो पाया, पत्रिकाएं और भी थीं, गाहे-बगाहे उन्हें भी पढ़ता था. तभी किसी के यहाँ धर्मयुग का होली अंक पढ़ने को मिला, फागुनी हास्य से भरपूर, बीच के पन्नों (फुल पेज) में टेसू के फूलों के बीच एक अल्हड नवयौवना कि तस्वीर के साथ "यार कमाल हो गए" कविता, मेरा किशोर मन बाग़-बाग़ हो गया. वहाँ से सीधा बुक कार्नर गया( अंबिकापुर में तब वो पत्रिकाएं मिलने का एकमात्र स्थान था), काउंटर पर बैठे सेठी अंकल ने बताया कि बेटे धर्मयुग का होली अंक तो आते ही पूरा बिक जाता है' मैंने जिद की, उन्होंने बाद में मंगा कर देने की बात कही. बाद के वर्षों में जब तक धर्मयुग छपती रही मैं जहां भी रहता, उसकी एडवांस बुकिंग करता रहा और होली में धर्मयुग की रचनाएँ पढ़ कर, होली की महफ़िलों में धाक जमाता रहा, रेडियो में भी जिक्र करता रहा. अफ़सोस की वो बंद हो गयी.
कुछ रचनाएँ आज भी याद आतीं हैं जिन्हें मैंने कई जगह पोस्ट किया है, कुछ यहाँ भी डाल रहा हूँ, पूरी तरह से याद नहीं हैं, रचनाकारों के नाम भी पूरे याद नहीं हैं, अगर किसी को पूरा याद हो तो मुझे जरूर अवगत कराएं-
१. ----?
टेसू वन दहके,
मौर रसाल हुए,
चितवन बहके,
गाल गुलाल हुए,
......... अंग अंग महके, यार कमाल हुए!
२. चन्द्र ठाकुर-
बुरा न मानो होली है, चुनरी गीली कर लेने दो,
ये रस की ऋतू, वय का उत्सव, बीत न जाए बिना मनाये,
लज्जा से अरुण कपोलों पर कुछ आज रंगोली कर लेने दो,
बुरा न मानो होली है, चुनरी गीली कर लेने दो....... .
३. नीरज-
प्यार के बोल तो बोलें सभी
पर प्यार की की न वो अब बोली रही है,
कान्हा की छेड़ न छाड़ रही वो अब
रहने को सिर्फ ठिठोली रही है,
रंग कहाँ पिचकारी कहाँ वो अब,
खाली गुलाल की झोरी रही है,
राग न वो अब, फाग न वो अब
होली न वो अब होली रही है.....
कमल दुबे.
गुरुवार, 25 फ़रवरी 2010
Silver To Sachin? Shame-Shame Gwalior.
Silver To Sachin? Shame-Shame Gwalior.
A silver bat is given to Sachin at Gwalior, what u think? Didn’t Sachin deserves Gold?
What I think is that that was the only momento available there and in a hurry they decided to present it to Sachin. Surely that readymade Silver bat is not made for the moment in which it was used. Shame on u Gwalior!
Kamal Dubey.
A silver bat is given to Sachin at Gwalior, what u think? Didn’t Sachin deserves Gold?
What I think is that that was the only momento available there and in a hurry they decided to present it to Sachin. Surely that readymade Silver bat is not made for the moment in which it was used. Shame on u Gwalior!
Kamal Dubey.
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