मंगलवार, 13 सितंबर 2011

It Happens….


Train accident because of emergency breaks..
 D and L system calculated draw an one day cricket match…..Amazing
१.... ट्रेनों में इमरजेंसी ब्रेक हादसों को रोकने के लिए होते हैं और पिछले दिनों एक ट्रेन में इमरजेंसी ब्रेक लगाने से एक्सीडेंट हो गया...
२.  डकवर्थ और लूइस प्रणाली सीमित ओवरों के क्रिकेट मैचों में जीत-हार के नतीजों तक पहुँचने के लिए अपनाई गई है और इसके अनुसार पिछले दिनों एक वन डे मैच ड्रा हो गया......ऐसा भी होता है:

बुधवार, 31 अगस्त 2011

रविवार, 28 अगस्त 2011

अब कितने दिन में?

अन्ना के अनशन पर कुछ मैं भी लिख दूं ये सोच कर बैठा, अभी नोटिफिकेशन ही देख रहा था कि बगल में मेरा बेटा आ बैठा, कक्षा नवमी का छात्र है. पूछने लगा कि अब कितने दिन में प्रधानमंत्री और बाकी मुख्यमंत्रियों का पैसा जब्त होके सरकारी खजाने में आ जायेगा? मेरा मुंह खुला रह गया, मैं कुछ बोल पाता इससे पहले उसने एक और सवाल दाग दिया क्या ये सही है कि विदेशों में जमा पैसा वापस आने पर दस साल तक इस देश में टैक्स नहीं लगेगा? ऐसा कब होगा? और... और....... मैंने कहा बस कर और उससे पूछा किसने तुम से ये सब कहा है? जवाब आया ये बातें तो रोज़ हमारे स्कूल में साथी लोग कह रहे हैं.
अब मैंने सब काम छोड़ कर उसे लोकपाल और जनलोकपाल का मतलब बताया, स्थाई समिति के बारे में बताया, ये भी बताया कि विदेश में जमा धन वापस लाने का आन्दोलन रामदेव बाबा का था. आधे घंटे की इस क्लास में उसे कितना समझ में आया? ये तो मैं नहीं जानता लेकिन सिटीजन चार्टर की बात पर ये जानकर कि  अधिकारियों की तनखा से जुर्माने की राशि कटेगी उसे मजा आ गया. अभी भी वो मेरी बगल में बैठा है मुझे ये लिखते देख कर कह रहा है, पापा काफी हद तक सब समझ में आ गया है.......?

गुरुवार, 18 अगस्त 2011

मैं अण्णा!

सोलह अगस्त के बाद अन्ना होने के मायने बदल गए हैं. "मैं अन्ना का" नारा भी स्वस्फूर्त हो गया है.
बचपन से सुनते आये हैं "हर शाख पे उल्लू बैठा है, अंजामे गुलिस्तां क्या होगा"?
आज कल्पना कर रहा हूँ- "जब हर शाख पे एक अन्ना होगा, रंग ए हिन्दुस्तां क्या होगा?

रविवार, 14 अगस्त 2011

Shammi Kapoor......

बचपन से जिसके गाने सुन-सुन कर जवानी में थिरके थे, तब कोई यदि हमें जंगली कहता था तो लगता था मानो कोई ख़िताब मिल गया हो. शम्मी कपूर का जाना आज की दु:खद खबर. हमेशा याद रहेंगे. भगवान् उनकी आत्मा को शांति दे. उनके परिवार व लाखों प्रशंसकों को इस दु:ख को सहने की क्षमता दे. आमीन!

रविवार, 7 अगस्त 2011

70 सालों से दोस्ती की अटूट मिसाल, Dainik Bhaskar, Bilaspur

 07-08-2011
आज भास्कर के बिलासपुर एडिशन में दोस्ती दिवस पर मेरे डैडी और प्रेम चाचा की मित्रता की चर्चा. पता चला कि लेखिका मंजुला जैन को प्रेम चाचा के पुराने पड़ोसियों टंडन परिवार ने आइडिया दिया था. संज्ञा जी, राजेश जी आभार
मंजुला जैन. बिलासपुर

पाश्चात्य संस्कृति का अनुसरण करते हुए अगस्त के पहले रविवार को लोग दोस्ती के पर्व के रूप में सेलिब्रेट करते हैं, लेकिन ऐसे लोगों के लिए शहर के दो दोस्त मिसाल हैं जो 70 वर्षों से एक-दूसरे का सुख-दुख बांट रहे हैं।

विनोबा नगर निवासी सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया से सेवानिवृत्त रीजनल मैनेजर नारायण प्रसाद दुबे व क्रांतिनगर निवासी सेवानिवृत्त फूड कंट्रोलर प्रेमकुमार श्रीवास्तव की दोस्ती खपरगंज स्थित प्राइमरी स्कूल से शुरू हुई। उस समय दोनों कक्षा पहली में पढ़ते थे। स्कूली शिक्षा के बाद एसबीआर कॉलेज में दोनों ने बीए भी साथ ही किया। कॉलेज की शिक्षा के बाद श्री दुबे नौकरी के लिए भिलाई चले गए और श्री श्रीवास्तव अंबिकापुर। 13 साल तक वे दोनों एक दूसरे से नहीं मिल सके, लेकिन पत्रों के माध्यम से उनका संपर्क बराबर रहा। अभिन्न दोस्तों के बीच दूरी शायद ईश्वर को भी मंजूर नहीं थी, इसलिए 13 साल दूर रहने के बाद वे फिर मिले।

श्री दुबे का कहना है कि उन्हें प्रेमकुमार का शांत, गंभीर, अपने से बड़े अधिकारियों को लेकर चलने की कला ने इतना प्रभावित किया कि उसका अनुसरण उन्होंने भी किया। वहीं श्री श्रीवास्तव ने कहा कि नारायण की निश्छल, स्पष्टवादिता उन्हें काफी पसंद आई और वे उनके खास दोस्त बन गए। श्री दुबे ने कहा कि आजकल की दोस्ती दिखावे की है। इसके पीछे कहीं न कहीं स्वार्थ छिपा होता है। हमने दोस्ती को कभी भी सेलिब्रेट नहीं किया, इसे महसूस किया और हर पल जिया है। अच्छा मित्र मिलना किस्मत की बात होती है। जिस तरह बिना गुरु के ज्ञान नहीं होता उसी तरह बिना मित्र के जीवन नहीं चल सकता। मित्रता अमर रहे और आखिरी सांस तक वे इसे शिद्दत से जीते रहे, यही उनकी इच्छा है।

बच्चों की शादी का उठाया जिम्मा

श्री श्रीवास्तव ने बताया कि उनकी बेटी सुनीता के विवाह के समय लड़का देखने जाने से लेकर सभी इंतजाम करने की जिम्मेदारी नारायण दुबे को दी गई थी। उनकी पसंद के लड़के से ही बेटी का विवाह हुआ। वहीं नारायण प्रसाद दुबे के
बेटियोंके विवाह का सभी इंतजाम प्रेमकुमार ने किया। परिवार के सभी छोटे-बड़े निर्णय दोनों की रजामंदी से ही होते हैं। एक दूजे पर संकट आने से पहले वे ढाल बनकर खड़े होते हैं।

दूसरों के लिए बने प्रेरणा

प्रेमकुमार व नारायण प्रसाद की घनिष्ठ दोस्ती उनके परिवार के लिए भी मिसाल है। उनके नाती-पोते भी उनके जैसी दोस्ती निभाने की तमन्ना रखते हैं। वहीं कॉलोनी व दोस्तों के बीच यह दोस्ती लोगों को प्रेरणा देने का काम करती है।
 
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आज पिताश्री ने मित्र के गुण पर
रामचरितमानस:किष्किन्धाकाण्
​ड की कुछ चौपाइयां सुनाई -

जे न मित्र दुख होहिं दुखारी। तिन्हहि बिलोकत पातक भारी॥
निज दुख गिरि सम रज करि जाना। मित्रक दुख रज मेरु समाना॥
जिन्ह कें असि मति सहज न आई। ते सठ कत हठि करत मिताई॥
कुपथ निवारि सुपंथ चलावा। गुन प्रगटे अवगुनन्हि दुरावा॥
देत लेत मन संक न धरई। बल अनुमान सदा हित करई॥
बिपति काल कर सतगुन नेहा। श्रुति कह संत मित्र गुन एहा॥
आगें कह मृदु बचन बनाई। पाछें अनहित मन कुटिलाई॥
जा कर चित अहि गति सम भाई। अस कुमित्र परिहरेहि भलाई॥
सेवक सठ नृप कृपन कुनारी। कपटी मित्र सूल सम चारी॥
सखा सोच त्यागहु बल मोरें। सब बिधि घटब काज मैं तोरें॥

बुधवार, 20 जुलाई 2011

AIRTEL का 198... शिकायत की क्या?




 अब जबकि फोन खिलौना हो गया है, निजी कंपनियों ने ग्राहक सेवा के मायने बदल कर रख दिए हैं बावजूद इसके एक नई समस्या पैदा हो गई है. अगर आपके यहाँ एयरटेल (निजी कंपनी) का फोन लगा है तो आप भी इससे रूबरू हो चुके होंगे, अगर नहीं तो तैयार हो जाइए. ये समस्या तब उपजती है जब आपका फोन खराब हो जाता है और उसकी शिकायत दर्ज करानी होती है. सबसे पहले अपने ऐसे परिचित को खोजना पड़ता है जिसके यहाँ उसी कंपनी का फोन हो, उनके यहाँ अनुमति लेने के बाद 198 डायल कीजिये..... कुछ सेकेण्ड संगीत सुनिए, फिर आवाज़ आएगी +ये नंबर शिकायत दर्ज कराने के लिए है, अगर आपको बिल या अन्य सेवाओं सम्बंधित कोई जानकारी चाहिए तो कृपया 121 डायल करें+... फिर संगीत.... उसके बाद आपको उस फोन के बिल का हाल सुना दिया जाएगा, संगीत... आवाज़ ..अंग्रेजी के लिए एक... हिंदी के लिए दो डायल करें संगीत..... आवाज़... इसी नंबर की शिकायत के लिए एक, अन्य नंबर के लिए दो डायल करें,   संगीत.... फिर कुछ इस तरह के अनुरोध ... लाइन में खराबी के लिए एक, इंस्ट्रूमेंट में खराबी के लिए दो, फोन पूरी तरह से बंद है तो तीन डायल करें..... हमारे अधिकारी से बात करने के लिए नौ डायल करें,  फिर संगीत.. फोन से ज़रा नज़र हटा कर देखेंगे तो पता चलेगा कि तीन मिनट से ऊपर हो चुके हैं और फोन का मालिक आपको घूर रहा है, आप असहज हो जातें हैं, उधर फोन पर आवाज़ आ रही है कि आपकी काल हमारे अधिकारी के पास ट्रांसफर की जा रही है..... जो रिकार्ड भी की जा सकती है..... आपका काल हमारे लिए महत्वपूर्ण है कृपया लाइन पर रहें.... पांच मिनट हो चुके हैं अब फोन मालिक को शक होने लगता है कि ये शिकायत का नाम ले कर भविष्यवाणी तो नहीं सुन रहा है? जिसका बिल तगड़ा आता है.... और फोन कट जाता है... शिकायत दर्ज नहीं हुई.. फिर वही सिलसिला.. वही दोहराव... अंत में अधिकारी हाज़िर होतें हैं... नमस्कार मैं फलां बोल रहा/रही हूँ मैं आपकी क्या सहायता कर सकता हूँ.... आप अपना नंबर बताएँगे... वहाँ से एस टी डी कोड पूछा जाएगा, फिर आपका नाम, पता, इ मेल आई डी, मोबाइल नंबर की जानकारी ली जायेगी, फिर पूछ जाएगा क्या आपने अपना इंस्ट्रूमेंट चेक किया है? लाइन चेक की? डिब्बी देखी आदि-आदि... जब तक आप आपनी खोपड़ी के बाल नहीं नोचने लगेंगे तब-तक वहां से पूछताछ जारी रहेगी... और अंत में कम्प्लेंट नंबर इतना लंबा बताया जाएगा कि याद रखना मुश्किल. एक शिकायत दर्ज कराने में इतना समय, अब तो ये हाल है कि किसी के यहाँ आप पहुँच कर कहेंगे कि फोन की शिकायत करनी है तो हो सकता है कि जवाब आये.. अरे मेरा भी फोन खराब है....?

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हाथ में मोबाइल लेकर घूम रही नई पीढ़ी को फोन पाने का वो दर्द नहीं मालूम है जो हमारी उम्र ने झेला है. नंबर लगाने के बाद लंबा इन्तजार, लाइनमैन देवदूत लगता था,  दूर से उसे आते देख लपक पड़ते थे हमारा नंबर आया क्या? मायूसी ही हाथ लगा करती थी. फिर सांसद कोटे के लिए प्रयास.... और अंत में ओ वाय टी स्कीम में साढ़े सात  हज़ार जमा करने के हफ्ते भर बाद दो लोग आये और घर की बालकनी में लोहे का एंगल ठोक, उसमे चीनी-मिटटी की गुम्बदनुमा आकृति लगा, चाय-नाश्ता कर विदा हो गए. तय हो गया कि फोन लगने वाला है. अडोस-पड़ोस से जलने कि बू के साथ बधाई सन्देश आने लगे. अब इन्तजार था उन तारों का जिन पर चल कर लाइन आती, फिर दो तीन दिन गुजर गए, देवदूत को पकड़ा तो उसने बताया कि आपके घर के पास के खम्बे में लगी डी बी में जगह नहीं है, साहब से बोल कर लंबा तार दिलवाइए. एक और कवायद हुई तब जा के फोन लगा. ग्राहक सेवा का हाल सरकारी ही था, एस टी डी सुविधा तब शुरू नहीं हुई थी, दूसरे शहर बात करनी हो तो ट्रंक बुक करो उसके बाद सबकुछ छोड़ के फोन के पास घंटो बैठे रहो न जाने कब काल लग जाए, विपत्ति में चार गुना रेट पर लाइटनिंग काल किये जाते थे.