शुक्रवार, 8 जनवरी 2010

RSBY- Kyaa Yojanaa Hai?



राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना भारत सरकार की एक ऐसी योजना है जिसके तहत गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले
परिवारों को एक स्मार्ट कार्ड दिया जा रहा है, जिसमे तीस हज़ार रुपये तक की राशि जमा होती है. ए टी एम् की तरह दिखने वाले इस कार्ड में परिवार के मुखिया सहित सभी सदस्यों की फोटो,  उम्र सहित पूरी जानकारी डिजिटली डाली हुई होती है. परिवार के किसी सदस्य को कोई बीमारी होने पर वो आर एस बी वाई से आन लाइन जुड़े किसी सरकारी अथवा निजी अस्पताल में जा कर वहाँ अपना इलाज/आपरेशन इस कार्ड के मार्फ़त निःशुल्क करा सकता है. नियत अवधि के लिए जारी किये गए इस कार्ड से उक्त संस्थान द्वारा किये गए इलाज की फीस विभिन्न बीमा एजेंसियों के माध्यम से सरकार उस अस्पताल के खाते में जमा करा देगी.  हर तरह के इलाज की दरें तय हैं, जिसमें मरीज के भर्ती होने से लेकर दवा और खाने का खर्च भी सम्मिलित है.
छत्तीसगढ़ के बिलासपुर शहर में अपना निजी अस्पताल चलाने वाले एक चिकित्सक दंपत्ति ने भी इस योजना से अपने अस्पताल को जोड़ा. सारी औपचारिकताओ को पूरा करने और कई दिनों की ट्रेनिंग के बाद जब उन्होंने इसकी आन लाइन कार्यप्रणाली समझ लीं तब उनके अस्पताल का नाम भी इस योजना की लिस्ट में आ गया.
उन्हें बहुत रोमांच हुआ जब इस योजना का पहला मरीज नए साल में उनके अस्पताल पहुंचा. कंप्यूटर आन किया गया, पहला प्रयास था सब कुछ सहज नहीं था डा. दम्पत्ति आन लाइन जानकारी नहीं ले पा रहे थे,  देरी होते देख उन्होंने तय किया कि पहले मरीज को भर्ती कर इलाज शुरू कर देतें हैं, बाद में आर एस बी आई से फ़ोन में सहायता मांग  कर रजिस्ट्रेशन आदि कर लेंगे. मरीज का इलाज शुरू हो गया, खून के सेम्पल जांच के लिए भेज दिए गए. बाद में जब डा. उसका हाल जानने उसके पास पहुंचे तो उसकी बात सुनके दंग रह गए! निरीह सा, अनपढ़, झोपड़पट्टी में रहने वाला वो मरीज उनसे पूछ रहा था और कह रहा था 'आप मुझे कितने पैसे देंगे पहले ये बताइये? नहीं तो में दूसरे अस्पताल चले जाउंगा, मैं वहीँ अपना इलाज कराऊंगा जहां मुझे ज्यादा रुपये मिलेंगे क्योंकि मुझे जिसने ये कार्ड दिलाया है उसे पैसे देने हैं और जिसने यहाँ भेजा है उसे भी पैसे देने हैं' और हाँ मैं आपके अस्पताल का खाना नहीं खाउंगा उसके पैसे आप मुझे अलग से दीजियेगा... डा. अवाक!
तब तक फोन पर खबर आ गई कि उक्त मरीज का कार्ड फ़रवरी से एक्टिवेट होगा, अभी उसे भर्ती न किया जाए.
अब तक जो खर्च होना था सो हो चुका था, मरीज को बोतल लगाईं गयी थी,  डा. ने अपने स्टाफ कहा कि जैसे ही ये बोतल पूरी हो इसे अस्पताल से बिना कोई फीस लिए विदा कर देना और आइन्दा इस योजना का कोई मरीज आये तो बिना बात किये या बिना रजिस्ट्रेशन के इलाज नहीं शुरू करना.... इति.

4 टिप्‍पणियां:

  1. वाह भाई, आपने इस पोस्ट से अपने ब्लाग के शीर्षक की सार्थकता बयां कर दी. एसा भी होता है.

    आज कल सबे अपन अपन चतुरई मे लगे हे भीख मंगई गरीबहा बनई सब आजकाल धन्धा बन गे हे.

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  2. सचमुच ग़रीब अब कार्ड की ही तरह स्मार्ट हैं. वे राशन दुकानों में चावल गेंहू नहीं छोड़ रहे, पूरा 35 किलो लेते हैं फिर खुद ही बाहर बेचते हैं.

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  3. बहुत खूब ....कमल जी यूँ ही घूमते घूमते आपके ब्लॉग तक आ गई ....पोस्ट भी पढ़ डाली .....इस गरीबी रेखा वाली बात की जानकारी तो पहली बार हुई ......पर गरीबी रेखा के ऊपर की बात तो गजब की है .....कुछ दिनों पहले सुना था गाँवों में खेती के लिए जो दालें या बीज दिए जाते हैं उनसे इनका साल भर का गुजारा आराम से हो जाता है ......!!

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  4. कमल भाई,
    आदाब अर्ज है ....
    ... नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं !!!!

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