शुक्रवार, 31 दिसंबर 2010

Village Raj Benda has some ancient history?

On 29th Dec. 2010 we were at Chilpi(Kabirdham Disst.) Cg. There we visited a nearby village Raj Benda, it is a village of Baiga tribes. There the villagers showed us debris of an old Shiv Temple and told us that some stones of this temple are transfered to Bhoram Dev's temple. have a look on some pics of that Shiv Temple and tell me is it discovered or not? 










Kamal Dubey

बुधवार, 15 दिसंबर 2010

जय बजरंगबली!

कल शाम बजरंगबली के एक मंदिर के पास मैं जाम में फंस गया. पता चला लंगर चल रहा है. टेंट हॉउस की टेबल लगी थी, पास ही बड़े-बड़े गंज रखे थे जिसमें मटर पनीर कि सब्जी भरी थी, बगल में एक बड़ी सी कढाई में पूरियां तली जा रही थी. सरक-सरक कर निकलते हुए मैंने पूछ लिया कि कितना खर्च हो रहा है? एक नौजवान ने बताया कि सात-आठ हज़ार की सब्जी पड़ रही है  और पूरी के लिए सौ किलो आटा, तेल व बनवाई का खर्चा अलग. मैंने फिर पूछ ही लिया किसने, किस ख़ुशी में लंगर खोला है? मेरे हाथ में एक दोना पकडाते हुए जवाब आया भैया आप पूरी सब्जी खाओ और बोलो जय बजरंगबली! बाकी बातों से आप का क्या लेना देना? स्कूटर घिसटते हुए खाना मुश्किल था, सो कहा गया गाडी खड़ी कर आराम से बैठ कर खा लीजिये, चारों तरफ कुर्सियां  पड़ी हुई हैं. खैर मैंने दोना पन्नी में रखवा लिया और आगे बढ़ते-बढ़ते फिर पूछा किसी की कोई मन्नत थी क्या?
अबकी बार जवाब कान में आया ऐसा ही समझ लीजिये, कल भाई का सट्टे में नंबर लगा और बड़ी रकम हाथ लगी है, उसमे से कुछ पैसों से ये लंगर खोला गया है ताकि भविष्य में भी हनुमान जी कि कृपा बनी रहे!
मेरे खुले हुए मुह से निकल ही पडा जय बजरंगबली!
कमल दुबे.

रविवार, 21 नवंबर 2010

चला गया पुंगी बजाने वाला..

ब्लिट्ज फेम, इंटरनॅशनल मीडिया फाउन्डेशन के अध्यक्ष  जी डी गोयल ने एक लम्बी बीमारी के बाद गत ११ नवम्बर को महाराष्ट्र के औरन्गाबाद के एक अस्पताल में अंतिम साँसें ली और हमेशा के लिए खामोशी की चादर ओढ़ ली. बीमारी की अवस्था में उनके औरन्गाबाद में रहने वाले पुत्र उन्हें अपने साथ ले गए थे.
पत्रकारिता का उनका अपना एक अंदाज़ था जिसकी वजह से वो काफी चर्चित रहे. मध्यप्रदेश निवासी स्व. श्री गोयल, दिल्लीवासी हो गए थे. लेकिन हिन्दुस्तान का शायद ही ऐसा कोई प्रान्त होगा जहां उनको जानने वाला कोई न हो? वो जहां जाते अपना एक नेटवर्क खड़ा कर लेते थे.  
छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद जब वो रायपुर आये तो वहीँ कैम्प बना लिया और अजय शर्मा के साथ मिलकर द कोल टाइम्स निकालने लगे. इसी दौरान मेरा भी उनसे मिलना हुआ और इस कदर मिलना हुआ कि वो जब भी बिलासपुर संभाग के दौरे पर निकलते तो बिलासपुर से मुझे साथ में ले लेते. सुबह पूडी-सब्जी खा कर निकलने का मेरी पत्नी मीनू का आग्रह वो सहर्ष स्वीकारते और फिर दौरों का अनथक सिलसिला शुरू हो जाता. ६० के ऊपर होने के बाद भी अपनी फिएट में वो दिल्ली से अकेले ही छत्तीसगढ़ आ जाते थे.
पुंगी बजाना उनका तकियाकलाम था. कोल टाइम्स के दौरान उनके साथ काम करने का एक अलग ही अनुभव रहा, एक बार उनके सामने एक बड़ी कंपनी के अधिकारियों से मेरी जम कर कहासुनी हो गयी तो उन्होंने सबके सामने मुझे फटकार लगाई,  कहा मुंह से क्यों हल्ला मचा रहे हो, तुम्हारे पास कलम है उससे हल्ला मचाओ, मुझे लिख कर दो और देखो मैं इनकी कैसे पुंगी बजाता हूँ? उन्होंने पुंगी बजाई भी. पुंगी बजाने का ये शगल अनेक अर्थों में हमेशा उनके साथ रहा.
रायपुर में अजय शर्मा जी की सन्गत का असर उन पर कुछ ऐसा पडा कि उनका झुकाव इलेक्ट्रानिक मीडिया कि ओर हो गया. छत्तीसगढ़ के बाद वो उत्तराखंड में भी रहे वहाँ से उनके बुलावे हमेशा आते रहे.  दिल्ली में उन्होंने इंटरनॅशनल मीडिया फाउन्डेशन की स्थापना की और किसी न किसी कार्यक्रम के बहाने दिल्ली के इंटरनॅशनल सेंटर में वो देश भर के पत्रकारों को हर साल बुलाते रहते. कुछ समय पहले तक वो जैन टीवी में रविवार दोपहर १२ बजे का सेगमेंट लेकर अर्थ शास्त्रियों के साथ चिंतन करते नज़र आते थे.
पिछले सप्ताह जब अजय भैया ने उनके निधन का समाचार दिया तो उनके साथ बिताये कई लम्हे एक साथ याद आ गए. अफ़सोस इस बात का कि अपने पिछले दिल्ली प्रवास में मैं उनसे नहीं मिल पाया. भगवान् उनकी आत्मा को शान्ति प्रदान करे. इति.
कमल दुबे.

शुक्रवार, 5 नवंबर 2010

3 G gaaliyaan!

काम कम और हल्ला ज्यादा! इसके क्या नतीजे होते हैं? इन दिनों मैं स्वयम इनको भुगत रहा हूँ. दरअसल अप्रेल के महीने में जब मेरा मल्टीमीडिया मोबाइल हैण्डसेट चोरी हो गया तो मैंने जून में सोनी इर्रिक्कशन का ३जी सेट लिया, फिर जब बाहर गया तो उस सेट में इंटरनेट कि स्पीड देख मैं दंग रह गया और वापस बिलासपुर आ कर मैंने साथियों के बीच इसकी जम कर चर्चा की. जुलाई में उक्त हैण्डसेट भी चोरी हो गया. फिर मैंने नोकिया सी ६  लिया जो पिछले महीने ही मुझे मिला था. उसके भी ३ जी होने कि खूब चर्चा हुई. नया मोबाइल चलता कम और हैंग ज्यादा होता था सो मैंने उसे मोबाइल स्टोर में वापस पटक दिया. फिर पिछले दिनों जब मेरा बेटा स्कूल टूर में जा रहा था तो मैंने उसे एक चायनीज सेट दिया लेकिन ध्यान रखा कि वो भी ३जी हो. बेटा जब वापस आया तो उसने बताया कि उसका सेट दो कौड़ी का है उसमे ३जी काम नहीं करता. मैंने उक्त सेट भी स्टोर में पटक दिया. अब मेरे पास मेरा पुराना हथौड़ा छाप सेट ही है जो काम आ रहा है.
अब पिछले दो तीन दिनों से बिलासपुर में दो कंपनियों ने एक साथ ३जी सेवाएँ शुरू कर दी हैं. मेरे कई परिचित ३जी सेवा टेस्ट करने या एक्टिवेट कराने में लगे हैं. उनसे पूछा जाता है कि कोई ऐसा नंबर बताओ जिसमे ३जी चालू हो तो आपको वीडिओ काल करके दिखाते हैं! आँख मूँद के मेरे साथी मेरा नंबर बता रहे हैं और उनके वीडिओ काल रीजेक्ट हो रहें हैं, क्योंकि मेरे हैण्ड सेट किस हाल में हैं इसकी चर्चा मैं पहले ही कर चुका हूँ, और उसके बाद शुरू हो रहा है ३जी गालियों का सिलसिला......
कमल दुबे.

सोमवार, 18 अक्तूबर 2010

Nokia C6 Very bad Phone

HI,

After a long wait I just procured my Nokia C6  3 days ago, and to be honest I am not able to use it. It hangs numerous times a day and the only way out is to disconnect the battery and plug it again.
Please help me in finding a solution for this asap.
Details of my set are-
Software Version- v 11.0.029
Software Version date- 11-08-10
Custom Version- 11.0.029.C01.01
 C. V. Date- 11-08-10
Language Set- 53
Model- C6-00
Type- RM-612
Kamal Dubey

शनिवार, 11 सितंबर 2010

बिलासपुर प्रेस ध्यान दे !

हाल में बिलासपुर छत्तीसगढ़ के मीडिया कर्मियों को जो अनुभव स्थानीय पुलिस से मिल रहे हैं उसमे अभी कई रंग और मिलने वाले हैं, क्योंकि प्रेस क्लब के वरिष्ठ सदस्य अपना दुखड़ा लेके जब पुलिस के आलाअधिकारी से मिले तो जो सलाह उन्हें दी गई उससे वो अभी तक सकते में हैं. प्रस्तुत हैं कुछ अंश-
* अरे इतने कैमरों कि जरूरत क्या है? आप लोग मिल बैठ कर तय कर लो कि किस कार्यक्रम में किसको जाना है? बाद में सभी लोग उससे फोटो या वीडियो शेयर कर लें.
* मैं तो मीडिया को रेगुलेट कर के ही रहूँगा! मेरे सामने ये भभड़ नहीं चलेगा, ये क्या तरीका है कि राज्यपाल भवन का उदघाटन करने के बाद पौधा रोपण करने जा रहे तो पच्चीस-तीस कैमरा उनके आगे-पीछे दौड़ने लगे? अरे भाई कितनी फोटो खीचोगे कितनी फोटो छपती है?
* ये कैमरामैन वी आई पी की सुरक्षा के लिए ख़तरा हैं. ये इनके लिए निर्धारित जगह पर कभी नहीं रहते सब तरफ घूम-घूमकर कैमरा चलाते रहते हैं, अरे कितने एंगल चाहिए?
* जहां धक्का-मुक्की होगी वहाँ पुलिस आएगी और उनको बाहर निकालेगी ही, क्योंकि पुलिस का काम ही है वव्यस्था  बनाना.
* आप को प्रशासन के साथ बैठ कर ये तय कर हमें बताना होगा कि किसी कार्यक्रम मैं कितने स्टिल और कितने वीडियो कैमरे जायेंगे. इसके लिए आप चाहे सोनमणि के साथ बैठे या बैजेन्द्र कुमार के साथ, बैजेन्द्र का नंबर दूं? मैंने उन्हें पत्र भी लिखा है, या फिर मुख्यमंत्री से ही मिल कर ये बातें तय कर लें.....
तो भाइयों क्या विचार हैं आपके?
बाहर वाले मीडिया कर्मियों को बता दूं कि बिलासपुर में बाईट लेने गए कैमरामेन को सरकारी काम में बाधा डालने का आरोप लगा कर हवालात में डाल दिया गया, पत्रकारों ने जब गुहार लगाईं तो उनसे कहा गया कि उनकी जमानत का बंदोबस्त करो!
* एक कार्यक्रम में सुआ नाच कि फोटो खींच रहे सीनियर फोटोग्राफर से कहा गया " तू भी उनके साथ नाचेगा क्या? निकल वहाँ से".... इससे वहाँ मौजूद पत्रकारों में हलचल होने लगी तो उनसे कहा गया कि अभी आप लोग भी बाहर जाओ जब जरूरत होगी आप को बुला लिया जाएगा.....
बहरहाल आगे क्या-क्या होता है? हम सब देखेंगे, हाँ इतना जरूर हुआ कि आलाअधिकारी के कमरे से बाहर निकलते हुए एक वरिष्ट पत्रकार ने कहा कि ये तो वैसे ही हो गया जैसे गली में यहाँ वहाँ, कहीं भी पेशाब कर देने वाले बच्चे की शिकायत करने मोहल्लेवाले जब उसके बाप के पास पहुंचे तो देखा कि वो खुद अपनी छत में खड़ा होकर दूसरे की छानी में मूत रहा है....

कमल दुबे. 

सोमवार, 30 अगस्त 2010

कुरु कुरु स्वाहा!

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पिछले कई बरसों से देख रहा हूँ कि बिलासपुर शहर में कहीं आग लगने पर स्थानीय युवकों व नेताओं के अन्दर मानो कोई दमकल जिन्न जाग उठता है? और वो पूरे अधिकार से वहाँ की कमान अपने हाथ में ले लेते हैं, फिर भिड़ जाते हैं आग बुझाने में.  दिन हो या रात हजारों तमाशबीन इकट्ठा तो हो ही जातें हैं उनके बीच ये बर्राए बौराए लोग चीख-चीख कर पता नहीं किस-किस को क्या-क्या निर्देश देते हुए नज़र आते हैं? इस बीच कोई पत्रकार या परिचित दिख जाए तो हाथ हिलाकर उसका अभिवादन भी कर लेतें हैं और किसी दमकल के पहुँचते ही दमकलकर्मियों के साथ उनकी पाईप पकड़ कर जहां तहां पानी मारना शुरू कर देते हैं, कोई प्लानिंग नहीं होती न ही ये सोचा जाता है कि कितनी दमकलें और कितना पानी लगना है, सबका  समन्वित उपयोग कैसे हो? यहाँ एस ई सी एल की दमकल(जिनको खदानों और कोयले की भीषण आग से खेलने का अनुभव रहता है), एन टी पी सी की दमकल(जहां आग और उसके ताप पर ही सब निर्भर है) और लाफार्ज की दमकल देर से ही सही पहुँच ही जाती हैं, लेकिन ये सब एक-एक कर आतीं हैं, खालीं होतीं हैं और चली जातीं हैं, ये सिलसिला लगातार चलता रहता है, चलता रहता है..आग पर पुरअसर हमला कभी नहीं होता और नतीजा हर बार एक सा ही रहता है कि आग तब ही बुझती है जब वहाँ जलने के लिए बाकी कुछ नहीं रहता.
पिछले शुक्रवार कि रात एक इलेक्ट्रानिक और फर्नीचर के बड़े शो रूम में आग लग गयी, शो रूम बंद नहीं हुआ था, आगत अनिष्ट की आशंका ने मालिक और कर्मियों को किमकर्त्तव्यविमूढ कर दिया! बदहवास से सब, कोई पुलिस, तो कोई दमकल को फोन लगाने लगा, कुछ सामान हटाने में लग गए, एकाध आग-आग चिल्लाते पड़ोसिओं से मदद की गुहार करने लगे. मददगार जुड़ने लगे सबसे पहले शो रूम का मेन स्वीच आफ किया गया(जरूरी था), वहाँ की पानी की मोटर बंद हो गयी, तब तक स्थानीय प्रशासन सक्रिय हो गया उसने उस पूरे इलाके की बिजली सप्लाई बंद करा दी, अड़ोसिओं और पड़ोसिओं के पम्प भी बंद.
पानी के लिए दमकल का ही आसरा रह गया, उसके आते-आते तक आग विकराल हो गयी. नगर निगम की बदहाल दमकल में इतना दम नहीं था कि उसकी धार आग पर सीधे मार कर सके, आग बढ़ती जा रही थी, एक-एक कर और दमकलें आने लगीं, दमकल जिन्नात भी हरक़त में आ चुके थे, कोई शटर में पानी मार रहा था, तो कोई साइन बोर्ड में, किसी ने बिजली के बोर्ड से धुआं निकलते देखा तो वहीँ धार मारने लगा. किसी को सूझा कि पीछे की दीवार को तोड़ कर वहाँ से पानी मारने से आग पर काबू जल्दी पाया जा सकता है, पिछवाड़े की गली संकरी थी, सो तोड़-फोड़ दस्ते के साथ छोटी दमकल वहाँ भेजी गयी. पीछे की दीवार टूटते ही अन्दर की आग को वेंटिलेशन मिल गया और वो दुगने वेग से भभक उठी, धन्य जिन्नात!
 घंटो बाद एन टी पी सी, सीपत की दमकल अपनी टीम के साथ वहाँ पहुंची, उनके स्पाट इंचार्ज ने हालात का जायजा लिया और बिना किसी की सुने अपनी टीम से कहा हम अन्दर जायेंगे और उनकी टीम अन्दर की और चल पड़ी, एक छुटभैये की कान में बात पड़ी और वो उनके सामने आकर चिल्लाने लगा अन्दर जाओ, अन्दर जाओ...बहरहाल इस टीम ने अन्दर जा कर आग पर असरदार हमला बोल दिया, पी कौशिक, इस टीम के स्पाट इंचार्ज ने बाहर आ कर कहा कि हम दस मिनट में आग बुझा देंगे बस इतना कीजिये की बाकी दमकलों का पानी हमारी दमकल में डालिए, इसका प्रेशर बहुत है, एक दमकल ने ऐसा करना शुरू भी कर दिया, तभी एक नेता ने उनसे कहा ये क्या कर रहे हो? तुम लोग अपनी पाइप यहाँ लाओ, पाइप उनकी तरफ चली गयी, अन्दर घुसी एन टी पी सी की टीम के पास पानी नहीं बचा, वो लोग मनमसोसकर कर बाहर आ गए !
दूसरे दिन सुबह आठ बजे तक उक्त शो रूम खंडहर बन चुका था. हाँ दमकल जिन्नों के अट्टहास वहाँ अभी भी गूँज रहें हैं. इति.       
 
कमल दुबे.
 

रविवार, 8 अगस्त 2010

Pramod Maravi

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 शिवतराई, कोटा, जिला बिलासपुर, छत्तीसगढ़.
पिछली ३१ जुलाई को २१ वर्षीय प्रमोद मरावी( गोंड आदिवासी) ने सुबह ९ बजे अपने घर में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली. उसने कोई सुसाइड नोट नहीं छोड़ा इसलिए आजतक ये पता नहीं चल पाया है कि उसने आखिर ऐसा क्यों किया? हमने पुलिस से पूछा, उसके मित्रों से मिले, उसके गाँव घर तक गए लेकिन कुछ भी पता नहीं चला.
प्रमोद ने बारहवीं की परीक्षा बायलाजी में सेकण्ड क्लास में उत्तीर्ण की थी. शिक्षा कर्मी बननेवाला था वो, कोटा कालेज में उसका फर्स्ट इयर में एडमिशन भी हो गया था. अल्पभाषी, संकोची प्रमोद मे कोई ऐब नहीं था. न कोई प्रेम-प्रसंग, ना ही वो कोई नशा करता था. तीरंदाजी से सबंधित इतने प्रमाण-पत्र  कि उनकी फोटोकॉपी कर कहीं जमा करने में ही फीस से ज्यादा पैसा उसे लगता. फिर क्यों? 
प्रमोद मरावी के इस तरह से चले जाने का मुझे और मेरे परिवार को बहुत अफसोस है. कारण कि आज से ढाई बरस पहले जब मुझे पता चला कि पंद्रह सौ की जनसंख्या(आदिवासी बाहुल्य) वाले शिवतराई जैसे छोटे से गाँव में तीरंदाजी के ३२ राष्ट्रीय और राज्यस्तरीय खिलाडी हैं तो में दूरदर्शन के लिए ये खबर बनाने वहाँ गया(२७-०१-२००८), अकेला था सो गाडी में बीबी-बच्चे भी आ गए. वहाँ हमने ५६ मिनट का फिल्मांकन किया, शिवतराई के लोगों ने मेरी और मेरे बच्चों की यथाशक्ति खातिरदारी की. बीबी-बच्चों को गाँव घुमाया.
सभी खिलाड़ियों से मैंने बातचीत की, उनके गुरु इतवारी राज से भी बात हुई. इसी दौरान में प्रमोद मरावी से भी मिला. उसकी तीरंदाजी से में बहुत प्रभावित हुआ, दूर से सीधा बुल्स आई! असीम संभावनाएं थीं उसमें! साथ के विडिओ में उसे देखें (दूरदर्शन से साभार).
भगवान् उसकी आत्मा को शान्ति प्रदान करे! इति.
कमल दुबे. ०८.०८.१०.

बुधवार, 21 जुलाई 2010

शनिवार, 3 अप्रैल 2010

ऐसा भी होता है!

शुक्रवार की दोपहर को न जाने कितने मकानों के मालिक रामविलास पासवान के दिल्ली स्थित एक मकान के पिछले हिस्से में आग लगी और दो कारें जल गयीं, ये समाचार लगभग सभी चैनलों में पहले ब्रेकिंग बाद में विस्तार के साथ चला. ठीक उसी दोपहरी को छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में भटचौरा नाम के एक गाँव में आग लगी ११ पैरावट और ३१ झोपड़ियां जल गईं, याने ३१ परिवार एक ही पल में छतविहीन हो गए, अनेकों के पास सिर्फ उतना ही बचा जितना कपड़ा वो पहने हुए थे. बाकी बर्तन-भांडा, कपड़ा-लत्ता, दानापानी, जमापूंजी और खटिया बिस्तर सब जल के खाक हो गया. पत्रकारों और संवाददाताओं को समय पर खबर लग गयी, लेकिन बड़े चैनलों को लिए ये कोई खबर नहीं थी. इति.

रविवार, 28 फ़रवरी 2010

होली और धर्मयुग

होली और धर्मयुग
पत्रिकाओं से मेरा नाता हमेशा से ही कुछ अजीब रहा है.  जब मैं बच्चा था किसी ने हाथ में पराग' पकड़ा दी, उन दिनों वो किशोरों कि पत्रिका हुआ करती थी, मेरे किशोर होते तक पराग" बच्चों कि पत्रिका हो गयी, मैंने पहली धारावाहिक कहानी "बहत्तर साल का बच्चा" पराग में ही पढ़ी. चंदामामा से मेरा जुड़ाव नहीं हो पाया, पत्रिकाएं और भी थीं, गाहे-बगाहे उन्हें भी पढ़ता था. तभी किसी के यहाँ धर्मयुग का होली अंक पढ़ने को मिला, फागुनी हास्य से भरपूर, बीच के पन्नों (फुल पेज) में टेसू के फूलों के बीच एक अल्हड नवयौवना कि तस्वीर के साथ "यार कमाल हो गए" कविता, मेरा किशोर मन बाग़-बाग़ हो गया. वहाँ से सीधा बुक कार्नर गया( अंबिकापुर में तब वो पत्रिकाएं मिलने का एकमात्र स्थान था), काउंटर पर बैठे सेठी अंकल ने बताया कि बेटे धर्मयुग का होली अंक तो आते ही पूरा बिक जाता है' मैंने जिद की, उन्होंने बाद में मंगा कर देने की बात कही. बाद के वर्षों में जब तक धर्मयुग छपती रही मैं जहां भी रहता, उसकी एडवांस बुकिंग करता रहा और होली में धर्मयुग की रचनाएँ पढ़ कर, होली की महफ़िलों में धाक जमाता रहा, रेडियो में भी जिक्र करता रहा. अफ़सोस की वो बंद हो गयी.
कुछ रचनाएँ आज भी याद आतीं हैं जिन्हें मैंने कई जगह पोस्ट किया है, कुछ यहाँ भी डाल रहा हूँ, पूरी तरह से याद नहीं हैं, रचनाकारों के नाम भी पूरे याद नहीं हैं, अगर किसी को पूरा याद हो तो मुझे जरूर अवगत कराएं-
१. ----?
टेसू वन दहके,
मौर रसाल हुए,
चितवन बहके,
गाल गुलाल हुए,
......... अंग अंग महके, यार कमाल हुए!
२. चन्द्र ठाकुर-
बुरा न मानो होली है, चुनरी गीली कर लेने दो,
ये रस की ऋतू, वय का उत्सव, बीत न जाए बिना मनाये,
लज्जा से अरुण कपोलों पर कुछ आज रंगोली कर लेने दो,
बुरा न मानो होली है, चुनरी गीली कर लेने दो....... .
३. नीरज-
प्यार के बोल तो बोलें सभी
पर प्यार की की न वो अब बोली रही है,
कान्हा की छेड़ न छाड़ रही वो अब
रहने को सिर्फ ठिठोली रही है,
रंग कहाँ पिचकारी कहाँ वो अब,
खाली गुलाल की झोरी रही है,
राग न वो अब, फाग न वो अब
होली न वो अब होली रही है.....
कमल दुबे.

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2010

Silver To Sachin? Shame-Shame Gwalior.

Silver To Sachin? Shame-Shame Gwalior.


A silver bat is given to Sachin at Gwalior, what u think? Didn’t Sachin deserves Gold?

What I think is that that was the only momento available there and in a hurry they decided to present it to Sachin. Surely that readymade Silver bat is not made for the moment in which it was used. Shame on u Gwalior!

Kamal Dubey.

गुरुवार, 18 फ़रवरी 2010

ऐसा क्यों होता है?

नए सबक, नए पहलू और नए नज़रिए सिखलातीं, दिखातीं और बनातीं कुछ असहज घटनाओं को सहजता से लेने का सब से अच्छा तरीका है, अपने आप से ये कहना कि " ऐसा भी होता है"!
फिर भी अपने आसपास कुछ न कुछ ऐसा हो जाता है जिस पर मन पूछता है कि ऐसा क्यों होता है?
एक निजी नर्सिंग होम के सामने देखा कि अकेला खड़ा एक युवक सूनसान कोने में अपनी डबडबाई आखों को पोंछ रहा है, उसके पास उस समय कोई कंधा नहीं था जिस पर सर रख वो रो सके, ना ही कोई हाथ था जो उसके कंधो पर आ उसे ढाढस दे. पास से गुजरते नर्सिंग होम के स्टाफ को रोक मैंने धीरे से उसकी और इशारा कर पूछा क्या हुआ? स्टाफ ने बताया उसका एक साल का बच्चा अभी अभी ख़तम हो गया है. मैंने पूछा कैसे? उसने बताया कि मरणासन्न अवस्था में बच्चा यहाँ लाया गया था, सफ़ेद पड़ चुके, सूख चुके उस बच्चे को देखते ही डाक्टर ने कहा था कि "अब तो इसकी चंद साँसे ही शेष हैं कुछ भी नहीं हो सकता". तब उसके माँ बाप ने कहा "आप कोशिश तो करें, जो भी खर्च हो, इसे बचाएं". कोशिशें कामयाब नहीं हुईं.
स्टाफ ने आगे बताया कि आज से पंद्रह-बीस दिन पहले जब पहली बार इस बच्चे को यहाँ लाया गया था तब खून कि जांच में ये पता चल चुका था कि ये बच्चा थैलसीमिया के रोग से ग्रसित है. तभी डाक्टर ने इनसे कहा था कि बच्चे की हालत नाज़ुक है, इसे तत्काल भर्ती कर खून चढ़ाना होगा, एक से दो हज़ार का खर्चा है. लेकिन प्राथमिक उपचार के बाद इसके माँ बाप ने इसे घर ले जाने की बात की, तो भी डाक्टर ने कहा था कि बच्चे की हालत गंभीर है तुम खून का इंतजाम कर लो, बाकी पैसे बाद में दे देना. लेकिन वो नहीं माने, डाक्टर ने फिर चेताया था कि इसे इलाज़ की सख्त जरूरत है यहाँ नहीं तो किसी सरकारी अस्पताल में ले जाओ या गनियारी के जन स्वास्थ्य सहयोग केंद्र में जाओ जहां कम खर्च में इलाज़ होता है. वो बच्चे को ले निकल गए.
उस दिन के बाद आज ये यहाँ फिर आये हैं, उस बच्चे को देख कर ही लग रहा था कि इस दौरान उसके इलाज़ की कोई कोशिश नहीं की गई है? स्टाफ ने धीरे से एक बात और कही कि इसकी बीबी ने बताया है कि इसके पहले इनके दो और बच्चे भी बीमारी में ही गुजरें हैं.
मैंने वापस उस युवक पर निगाह डाली, पच्चीस-तीस साल का वो युवक पहनावे से शहरी दिखाई दिया, कुछ समय बाद उसकी बीबी बाहर आई, वो भी अनपढ़ नहीं दिखी. उनके पास सिर्फ एक आदमी और औरत ही पहुंचे जो कि उन्हें वहाँ से ले गए. मैं सोचता रह गया कि किस कारण से ये बच्चे का इलाज़ नहीं करा पाए? क्या उनके पास पैसे नहीं थे? (आज पैसे तो थे लेकिन बच्चा नहीं था), या फिर कोई और सोच रही होगी?
रही थैलसीमिया से होने वाली बीमारी के बारे में जानकारी की तो इस इलाके में तमाम सरकारी और गैर-सरकारी संगठन इसके प्रचार-प्रसार में लगे हुए हैं. अंत में ये सवाल कि जब पाल नहीं सकते तो लोग बच्चे पैदा क्यों करते हैं? इति.
गलत जानकारी मिलने के कारण पूर्व में इस पोस्ट पर बीमारी का नाम सिकलसेल  चला गया था. क्षमा चाहता हूँ.
कमल दुबे.

शुक्रवार, 8 जनवरी 2010

RSBY- Kyaa Yojanaa Hai?



राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना भारत सरकार की एक ऐसी योजना है जिसके तहत गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले
परिवारों को एक स्मार्ट कार्ड दिया जा रहा है, जिसमे तीस हज़ार रुपये तक की राशि जमा होती है. ए टी एम् की तरह दिखने वाले इस कार्ड में परिवार के मुखिया सहित सभी सदस्यों की फोटो,  उम्र सहित पूरी जानकारी डिजिटली डाली हुई होती है. परिवार के किसी सदस्य को कोई बीमारी होने पर वो आर एस बी वाई से आन लाइन जुड़े किसी सरकारी अथवा निजी अस्पताल में जा कर वहाँ अपना इलाज/आपरेशन इस कार्ड के मार्फ़त निःशुल्क करा सकता है. नियत अवधि के लिए जारी किये गए इस कार्ड से उक्त संस्थान द्वारा किये गए इलाज की फीस विभिन्न बीमा एजेंसियों के माध्यम से सरकार उस अस्पताल के खाते में जमा करा देगी.  हर तरह के इलाज की दरें तय हैं, जिसमें मरीज के भर्ती होने से लेकर दवा और खाने का खर्च भी सम्मिलित है.
छत्तीसगढ़ के बिलासपुर शहर में अपना निजी अस्पताल चलाने वाले एक चिकित्सक दंपत्ति ने भी इस योजना से अपने अस्पताल को जोड़ा. सारी औपचारिकताओ को पूरा करने और कई दिनों की ट्रेनिंग के बाद जब उन्होंने इसकी आन लाइन कार्यप्रणाली समझ लीं तब उनके अस्पताल का नाम भी इस योजना की लिस्ट में आ गया.
उन्हें बहुत रोमांच हुआ जब इस योजना का पहला मरीज नए साल में उनके अस्पताल पहुंचा. कंप्यूटर आन किया गया, पहला प्रयास था सब कुछ सहज नहीं था डा. दम्पत्ति आन लाइन जानकारी नहीं ले पा रहे थे,  देरी होते देख उन्होंने तय किया कि पहले मरीज को भर्ती कर इलाज शुरू कर देतें हैं, बाद में आर एस बी आई से फ़ोन में सहायता मांग  कर रजिस्ट्रेशन आदि कर लेंगे. मरीज का इलाज शुरू हो गया, खून के सेम्पल जांच के लिए भेज दिए गए. बाद में जब डा. उसका हाल जानने उसके पास पहुंचे तो उसकी बात सुनके दंग रह गए! निरीह सा, अनपढ़, झोपड़पट्टी में रहने वाला वो मरीज उनसे पूछ रहा था और कह रहा था 'आप मुझे कितने पैसे देंगे पहले ये बताइये? नहीं तो में दूसरे अस्पताल चले जाउंगा, मैं वहीँ अपना इलाज कराऊंगा जहां मुझे ज्यादा रुपये मिलेंगे क्योंकि मुझे जिसने ये कार्ड दिलाया है उसे पैसे देने हैं और जिसने यहाँ भेजा है उसे भी पैसे देने हैं' और हाँ मैं आपके अस्पताल का खाना नहीं खाउंगा उसके पैसे आप मुझे अलग से दीजियेगा... डा. अवाक!
तब तक फोन पर खबर आ गई कि उक्त मरीज का कार्ड फ़रवरी से एक्टिवेट होगा, अभी उसे भर्ती न किया जाए.
अब तक जो खर्च होना था सो हो चुका था, मरीज को बोतल लगाईं गयी थी,  डा. ने अपने स्टाफ कहा कि जैसे ही ये बोतल पूरी हो इसे अस्पताल से बिना कोई फीस लिए विदा कर देना और आइन्दा इस योजना का कोई मरीज आये तो बिना बात किये या बिना रजिस्ट्रेशन के इलाज नहीं शुरू करना.... इति.