सोमवार, 30 अगस्त 2010

कुरु कुरु स्वाहा!

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पिछले कई बरसों से देख रहा हूँ कि बिलासपुर शहर में कहीं आग लगने पर स्थानीय युवकों व नेताओं के अन्दर मानो कोई दमकल जिन्न जाग उठता है? और वो पूरे अधिकार से वहाँ की कमान अपने हाथ में ले लेते हैं, फिर भिड़ जाते हैं आग बुझाने में.  दिन हो या रात हजारों तमाशबीन इकट्ठा तो हो ही जातें हैं उनके बीच ये बर्राए बौराए लोग चीख-चीख कर पता नहीं किस-किस को क्या-क्या निर्देश देते हुए नज़र आते हैं? इस बीच कोई पत्रकार या परिचित दिख जाए तो हाथ हिलाकर उसका अभिवादन भी कर लेतें हैं और किसी दमकल के पहुँचते ही दमकलकर्मियों के साथ उनकी पाईप पकड़ कर जहां तहां पानी मारना शुरू कर देते हैं, कोई प्लानिंग नहीं होती न ही ये सोचा जाता है कि कितनी दमकलें और कितना पानी लगना है, सबका  समन्वित उपयोग कैसे हो? यहाँ एस ई सी एल की दमकल(जिनको खदानों और कोयले की भीषण आग से खेलने का अनुभव रहता है), एन टी पी सी की दमकल(जहां आग और उसके ताप पर ही सब निर्भर है) और लाफार्ज की दमकल देर से ही सही पहुँच ही जाती हैं, लेकिन ये सब एक-एक कर आतीं हैं, खालीं होतीं हैं और चली जातीं हैं, ये सिलसिला लगातार चलता रहता है, चलता रहता है..आग पर पुरअसर हमला कभी नहीं होता और नतीजा हर बार एक सा ही रहता है कि आग तब ही बुझती है जब वहाँ जलने के लिए बाकी कुछ नहीं रहता.
पिछले शुक्रवार कि रात एक इलेक्ट्रानिक और फर्नीचर के बड़े शो रूम में आग लग गयी, शो रूम बंद नहीं हुआ था, आगत अनिष्ट की आशंका ने मालिक और कर्मियों को किमकर्त्तव्यविमूढ कर दिया! बदहवास से सब, कोई पुलिस, तो कोई दमकल को फोन लगाने लगा, कुछ सामान हटाने में लग गए, एकाध आग-आग चिल्लाते पड़ोसिओं से मदद की गुहार करने लगे. मददगार जुड़ने लगे सबसे पहले शो रूम का मेन स्वीच आफ किया गया(जरूरी था), वहाँ की पानी की मोटर बंद हो गयी, तब तक स्थानीय प्रशासन सक्रिय हो गया उसने उस पूरे इलाके की बिजली सप्लाई बंद करा दी, अड़ोसिओं और पड़ोसिओं के पम्प भी बंद.
पानी के लिए दमकल का ही आसरा रह गया, उसके आते-आते तक आग विकराल हो गयी. नगर निगम की बदहाल दमकल में इतना दम नहीं था कि उसकी धार आग पर सीधे मार कर सके, आग बढ़ती जा रही थी, एक-एक कर और दमकलें आने लगीं, दमकल जिन्नात भी हरक़त में आ चुके थे, कोई शटर में पानी मार रहा था, तो कोई साइन बोर्ड में, किसी ने बिजली के बोर्ड से धुआं निकलते देखा तो वहीँ धार मारने लगा. किसी को सूझा कि पीछे की दीवार को तोड़ कर वहाँ से पानी मारने से आग पर काबू जल्दी पाया जा सकता है, पिछवाड़े की गली संकरी थी, सो तोड़-फोड़ दस्ते के साथ छोटी दमकल वहाँ भेजी गयी. पीछे की दीवार टूटते ही अन्दर की आग को वेंटिलेशन मिल गया और वो दुगने वेग से भभक उठी, धन्य जिन्नात!
 घंटो बाद एन टी पी सी, सीपत की दमकल अपनी टीम के साथ वहाँ पहुंची, उनके स्पाट इंचार्ज ने हालात का जायजा लिया और बिना किसी की सुने अपनी टीम से कहा हम अन्दर जायेंगे और उनकी टीम अन्दर की और चल पड़ी, एक छुटभैये की कान में बात पड़ी और वो उनके सामने आकर चिल्लाने लगा अन्दर जाओ, अन्दर जाओ...बहरहाल इस टीम ने अन्दर जा कर आग पर असरदार हमला बोल दिया, पी कौशिक, इस टीम के स्पाट इंचार्ज ने बाहर आ कर कहा कि हम दस मिनट में आग बुझा देंगे बस इतना कीजिये की बाकी दमकलों का पानी हमारी दमकल में डालिए, इसका प्रेशर बहुत है, एक दमकल ने ऐसा करना शुरू भी कर दिया, तभी एक नेता ने उनसे कहा ये क्या कर रहे हो? तुम लोग अपनी पाइप यहाँ लाओ, पाइप उनकी तरफ चली गयी, अन्दर घुसी एन टी पी सी की टीम के पास पानी नहीं बचा, वो लोग मनमसोसकर कर बाहर आ गए !
दूसरे दिन सुबह आठ बजे तक उक्त शो रूम खंडहर बन चुका था. हाँ दमकल जिन्नों के अट्टहास वहाँ अभी भी गूँज रहें हैं. इति.       
 
कमल दुबे.
 

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