गुरुवार, 18 फ़रवरी 2010

ऐसा क्यों होता है?

नए सबक, नए पहलू और नए नज़रिए सिखलातीं, दिखातीं और बनातीं कुछ असहज घटनाओं को सहजता से लेने का सब से अच्छा तरीका है, अपने आप से ये कहना कि " ऐसा भी होता है"!
फिर भी अपने आसपास कुछ न कुछ ऐसा हो जाता है जिस पर मन पूछता है कि ऐसा क्यों होता है?
एक निजी नर्सिंग होम के सामने देखा कि अकेला खड़ा एक युवक सूनसान कोने में अपनी डबडबाई आखों को पोंछ रहा है, उसके पास उस समय कोई कंधा नहीं था जिस पर सर रख वो रो सके, ना ही कोई हाथ था जो उसके कंधो पर आ उसे ढाढस दे. पास से गुजरते नर्सिंग होम के स्टाफ को रोक मैंने धीरे से उसकी और इशारा कर पूछा क्या हुआ? स्टाफ ने बताया उसका एक साल का बच्चा अभी अभी ख़तम हो गया है. मैंने पूछा कैसे? उसने बताया कि मरणासन्न अवस्था में बच्चा यहाँ लाया गया था, सफ़ेद पड़ चुके, सूख चुके उस बच्चे को देखते ही डाक्टर ने कहा था कि "अब तो इसकी चंद साँसे ही शेष हैं कुछ भी नहीं हो सकता". तब उसके माँ बाप ने कहा "आप कोशिश तो करें, जो भी खर्च हो, इसे बचाएं". कोशिशें कामयाब नहीं हुईं.
स्टाफ ने आगे बताया कि आज से पंद्रह-बीस दिन पहले जब पहली बार इस बच्चे को यहाँ लाया गया था तब खून कि जांच में ये पता चल चुका था कि ये बच्चा थैलसीमिया के रोग से ग्रसित है. तभी डाक्टर ने इनसे कहा था कि बच्चे की हालत नाज़ुक है, इसे तत्काल भर्ती कर खून चढ़ाना होगा, एक से दो हज़ार का खर्चा है. लेकिन प्राथमिक उपचार के बाद इसके माँ बाप ने इसे घर ले जाने की बात की, तो भी डाक्टर ने कहा था कि बच्चे की हालत गंभीर है तुम खून का इंतजाम कर लो, बाकी पैसे बाद में दे देना. लेकिन वो नहीं माने, डाक्टर ने फिर चेताया था कि इसे इलाज़ की सख्त जरूरत है यहाँ नहीं तो किसी सरकारी अस्पताल में ले जाओ या गनियारी के जन स्वास्थ्य सहयोग केंद्र में जाओ जहां कम खर्च में इलाज़ होता है. वो बच्चे को ले निकल गए.
उस दिन के बाद आज ये यहाँ फिर आये हैं, उस बच्चे को देख कर ही लग रहा था कि इस दौरान उसके इलाज़ की कोई कोशिश नहीं की गई है? स्टाफ ने धीरे से एक बात और कही कि इसकी बीबी ने बताया है कि इसके पहले इनके दो और बच्चे भी बीमारी में ही गुजरें हैं.
मैंने वापस उस युवक पर निगाह डाली, पच्चीस-तीस साल का वो युवक पहनावे से शहरी दिखाई दिया, कुछ समय बाद उसकी बीबी बाहर आई, वो भी अनपढ़ नहीं दिखी. उनके पास सिर्फ एक आदमी और औरत ही पहुंचे जो कि उन्हें वहाँ से ले गए. मैं सोचता रह गया कि किस कारण से ये बच्चे का इलाज़ नहीं करा पाए? क्या उनके पास पैसे नहीं थे? (आज पैसे तो थे लेकिन बच्चा नहीं था), या फिर कोई और सोच रही होगी?
रही थैलसीमिया से होने वाली बीमारी के बारे में जानकारी की तो इस इलाके में तमाम सरकारी और गैर-सरकारी संगठन इसके प्रचार-प्रसार में लगे हुए हैं. अंत में ये सवाल कि जब पाल नहीं सकते तो लोग बच्चे पैदा क्यों करते हैं? इति.
गलत जानकारी मिलने के कारण पूर्व में इस पोस्ट पर बीमारी का नाम सिकलसेल  चला गया था. क्षमा चाहता हूँ.
कमल दुबे.

2 टिप्‍पणियां:

  1. ...मैं सोचता रह गया कि किस कारण से ये बच्चे का इलाज़ नहीं करा पाए? क्या उनके पास पैसे नहीं थे? (आज पैसे तो थे लेकिन बच्चा नहीं था), या फिर कोई और सोच रही होगी?....
    ....इस प्रश्न का उत्तर क्या हो सकता है! ...कुछ प्रश्नों के उत्तर निर्थक ही होते हैं ठीक उसी तरह इस प्रश्न का उत्तर भी "बच्चे की मौत" के साथ ही खत्म हो गया!!
    ......बेहद मार्मिक व कचोट देने बाली अभिव्यक्ति है, प्रभावशाली लेख !!!!!!

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  2. अधिकांश बच्चे बिना कामना के ही आजाते हैं

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